फिर हल्क़ा-ए-काकुल में पड़ीं दीद की राहें — मिर्ज़ा ग़ालिब
फिर हल्क़ा-ए-काकुल में पड़ीं दीद की राहें
जूँ दूद फ़राहम हुईं रौज़न में निगाहें
“Again, sight's paths fell into the tresses' coil; Like smoke in an opening, my gazes did toil.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
फिर देखने के रास्ते जुल्फों के घेरे में पड़ गए। मेरी निगाहें रौज़न में धुएँ की तरह इकट्ठी हो गईं।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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पाठ
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