ग़ज़ल

जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ'

جادۂ رہ خور کو وقتِ شام ہے تارِ شعاع
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 6 shers· radif: ताब-ए-इस्तिमाअ'

यह ग़ज़ल गहरे दार्शनिक विषयों को छूती है, जहाँ ढलते सूरज की किरणें और चाँद का विदा लेना जीवन की क्षणभंगुरता और संक्रमण को दर्शाते हैं। इसमें सुंदरता से उत्पन्न गहरी खामोशी और आश्चर्य का चित्रण है, साथ ही एक ऐसे दर्पण की बात की गई है जो निरंतर नवोन्मेष में लीन है। यह ग़ज़ल अस्तित्व की जटिलता और जीवन के संघर्षों तथा आश्चर्यों के बीच आत्मज्ञान और स्पष्टता की खोज पर मनन करती है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ' चर्ख़ वा करता है माह-ए-नौ से आग़ोश-ए-विदा'अ
शाम के समय, सूर्य का मार्ग प्रकाश का एक धागा मात्र है; आकाश नए चाँद के साथ विदाई का आलिंगन खोलता है।
2
शम्अ' से है बज़्म-ए-अंगुश्त-ए-तहय्युर दर दहन शोला-ए-आवाज़-ए-ख़ूबाँ पर ब-हंगाम-ए-सिमाअ'
खूबसूरत लोगों की आवाज़ों की लौ सुनकर, मोमबत्ती भी हैरानी से अपनी उंगली अपने मुँह पर रख लेती है और खामोश हो जाती है।
3
जूँ पर-ए-ताऊस जौहर तख़्ता मश्क़-ए-रंग है बस-कि है वो क़िबला-ए-आईना महव-ए-इख़तिराअ'
जैसे मोर के पंख का सार रंगों के अभ्यास का पट है, क्योंकि वह, जो आइनों का क़िबला है, नवाचार में लीन है।
4
रंजिश-ए-हैरत-सरिश्ताँ सीना-साफ़ी पेशकश जौहर-ए-आईना है याँ गर्द-ए-मैदान-ए-नज़ाअ'
जिनकी प्रकृति ही आश्चर्य करना है, उनकी यह रंजिश हृदय को शुद्ध करती है; क्योंकि यहाँ दर्पण का सार तत्व विवाद के युद्धक्षेत्र की धूल है।
5
चार सू-ए-दहर में बाज़ार-ए-ग़फ़लत गर्म है अक़्ल के नुक़साँ से उठता है ख़याल-ए-इन्तिफ़ाअ'
दुनिया में चारों ओर लापरवाही का बाज़ार गर्म है। अक्ल के नुकसान से ही फायदे का ख्याल उठता है।
6
आश्ना 'ग़ालिब' नहीं हैं दर्द-ए-दिल के आश्ना वर्ना किस को मेरे अफ़्साने की ताब-ए-इस्तिमाअ'
हे ग़ालिब, जो लोग खुद को परिचित समझते हैं, वे दिल के दर्द से वाकिफ नहीं हैं। वर्ना मेरे दुखभरे अफ़साने को सुनने की किसी में हिम्मत नहीं होती।
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