ग़ज़ल
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
عشرتِ قطرہ ہے دریا میں فنا ہو جانا
यह ग़ज़ल आध्यात्मिक उत्कर्ष और अस्तित्वगत विरोधाभासों के विषयों को दर्शाती है। यह बताती है कि वास्तविक आनंद बड़े में विलीन होने में है, और अत्यधिक दर्द ही उसका उपचार बन सकता है। कवि नियत वियोग और व्यर्थ संघर्षों में हृदय के थक जाने का विलाप करता है, जो क्रूरता से भी वंचित होने की मार्मिक भावना में समाप्त होता है।
Source: rekhta · HI
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1
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
एक बूँद की ख़ुशी दरिया में समा जाने में है। इसी तरह, जब दर्द अपनी हद से गुज़र जाता है, तो वह ख़ुद दवा बन जाता है।
2
तुझ से क़िस्मत में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
मेरे भाग्य में तुम्हारे साथ यही लिखा था कि अबजद के ताले की तरह, जैसे ही कोई बात या रिश्ता बनता, हम जुदा हो जाते।
3
दिल हुआ कशमकश-ए-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उक़दे का वा हो जाना
मेरा दिल इस दर्द के इलाज की कशमकश में पूरी तरह से खत्म हो गया। इस उलझी हुई गांठ को सुलझाने की कोशिश में मैं पूरी तरह से मिट गया।
4
अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
इस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना
हे अल्लाह, अब हम क्रूरता से भी वंचित हैं! वफ़ादार लोगों का इस हद तक दुश्मन बन जाना आश्चर्यजनक है।
5
ज़ोफ़ से गिर्या मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना
अत्यधिक कमज़ोरी के कारण मेरा रोना ठंडी आहों में बदल गया; तब हमें पानी के हवा हो जाने पर विश्वास हुआ।
6
दिल से मिटना तिरी अंगुश्त-ए-हिनाई का ख़याल
हो गया गोश्त से नाख़ुन का जुदा हो जाना
तुम्हारी मेहंदी लगी उँगली का ख़याल दिल से मिट जाना, गोश्त से नाख़ुन के जुदा हो जाने जैसा है।
7
है मुझे अब्र-ए-बहारी का बरस कर खुलना
रोते रोते ग़म-ए-फ़ुर्क़त में फ़ना हो जाना
मेरी इच्छा है कि मैं बसंत के बादल की तरह बरस कर खुल जाऊँ। जुदाई के दुख में लगातार रोते हुए समाप्त हो जाऊँ।
8
गर नहीं निकहत-ए-गुल को तिरे कूचे की हवस
क्यूँ है गर्द-ए-रह-ए-जौलान-ए-सबा हो जाना
अगर गुलाब की खुशबू को तुम्हारी गली की कोई चाहत नहीं है, तो वह सुबह की हवा के रास्ते की धूल क्यों बन जाती है?
9
बख़्शे है जल्वा-ए-गुल ज़ौक़-ए-तमाशा 'ग़ालिब'
चश्म को चाहिए हर रंग में वा हो जाना
ऐ ग़ालिब, फूल की सुंदरता देखने का आनंद देती है; आँख को हर रंग में खुला रहना चाहिए।
10
ता कि तुझ पर खुले एजाज़-ए-हवा-ए-सैक़ल
देख बरसात में सब्ज़ आइने का हो जाना
ताकि तुम हवा के चमकीलेपन का चमत्कार समझ सको, देखो कि बरसात में शीशा कैसे हरा हो जाता है।
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