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ग़ज़ल

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़

حریف مطلب مشکل نہیں فسون نیاز
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: बाज़

यह ग़ज़ल प्रेम और भक्ति की गहरी और अक्सर चुनौतीपूर्ण प्रकृति को दर्शाती है। कवि महबूब के लिए एक अटूट लालसा व्यक्त करता है, जिसकी उपस्थिति अभिभूत करने वाली और मायावी दोनों है। यह इच्छा की स्थायी प्रकृति पर विचार करती है, यह सुझाव देते हुए कि मृत्यु के बाद भी, महबूब की मनमोहक सुंदरता के लिए प्रेमी की तीव्र श्रद्धा बनी रहती है, जो आध्यात्मिक या रोमांटिक तड़प की गहराई को उजागर करती है।

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1
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़
प्रार्थना का जादू किसी कठिन लक्ष्य का प्रतिद्वंद्वी नहीं है। हे प्रभु, यह प्रार्थना स्वीकार हो कि खिज्र की आयु लंबी हो।
2
न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़
व्यर्थ में अस्तित्व के भ्रम रूपी रेगिस्तान में मत भटको। अभी भी तुम्हारे विचारों में उतार-चढ़ाव मौजूद हैं।
3
विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़
मिलन का नज़ारा बहुत भव्य है, पर मन में इतनी शक्ति कहाँ कि इंतज़ार के दर्पण को सजाया जा सके?
4
हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़
आशिक़ का हर एक ज़र्रा आफ़ताब-परस्त है। ख़ाक हो जाने पर भी महबूब के नाज़ुक जलवे की तमन्ना ख़त्म नहीं होती।
5
न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़
ग़ालिब, जुनून के मयख़ाने की विशालता के बारे में मत पूछो, जहाँ यह आकाश का कटोरा मात्र एक कूड़ादान है।
6
फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़
आविष्कार की कला के धोखे का तमाशा देखो, जहाँ नज़र (दृष्टि) छवियों को बेचती है और विचार (कल्पना) आइना गढ़ता है।
7
ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़
शिकारी का नज़ारा इतना अद्भुत और हैरान कर देने वाला है कि मन के पन्ने से उड़ान की सूरत भी उड़ गई है।
8
हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़
विचारों के हुजूम से मेरा दिल लहर की तरह काँप रहा है। क्योंकि दिल शीशे की तरह नाज़ुक है और विचार ऐसी शराब हैं जो शीशे को भी पिघला सकती हैं।
9
'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़
'असद' से वफ़ा छोड़ने का संदेह ऐसा अर्थ रखता है, जैसे किसी पक्षी के पर से उड़ान की आकृति बनाना।
10
हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़
अभी भी, हे दृष्टि के प्रभाव, रुस्वाई की शर्म कायम है। एक फ़ित्ना फैलाने वाली निगाह है, और दोनों जहाँ के दरवाज़े खुले हैं।
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