रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है
“No strength remains in speech, and even if it were there, On what hope should you ask what my desire is?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
बोलने की शक्ति बाकी नहीं है, और भले ही हो भी, तो किस उम्मीद पर आप पूछिए कि मेरी इच्छा क्या है।
विस्तार
यह शेर उस गहरे भावनात्मक थकावट को बयान करता है, जब दिल में इतना कुछ उमड़ रहा हो कि ज़ुबान पर कोई लफ़्ज़ न आ रहा हो। शायर कह रहे हैं कि मेरी ताक़त ही चली गई है.... और अगर वो ताक़त भी हो जाती, तो मेरी आरज़ू क्या है, यह आप कैसे जान पाएँगे? यह एहसास है ख़ामोशी का!
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