“The master of the feast strolls about, preening and showing off, Otherwise, what would be the honor of Ghalib in the city?”
किसी ने शह की तरह व्यवहार किया है और इतराकर घूम रहा है, वरना शहर में शायर की कोई इज़्ज़त क्या है।
दोस्तों, यह शेर सिर्फ़ एक बात नहीं कह रहा, यह तो ज़िंदगी के बड़े सच को बयां करता है। शायर यहाँ खुद को संबोधित कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि मेरी इज़्ज़त, मेरी आबरू, किसी निजी काबिलियत से नहीं है... बल्कि इस बात से है कि मैं किसके साथ जुड़ा हुआ हूँ। अगर वह सहारा छिन जाए, तो ये पूरा शहर मुझे क्या मानेगा? यह शेर हमें सिखाता है कि दुनिया में सहारे का होना कितना ज़रूरी है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
