रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

“We are not believers in wandering through the veins, If the eye itself does not shed, then what is blood?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

हम उन बातों पर विश्वास नहीं करते जो रगों में दौड़ती हैं। अगर यह आँख से न टपके, तो यह रक्त क्या है।

विस्तार

यह शेर दर्द और उसके स्वरूप पर एक गहरा सवाल उठाता है। मिर्ज़ा ग़ालिब कहते हैं कि अगर कोई दर्द, कोई चोट, आँखों से आँसू बनकर न टपके.... तो क्या वह दर्द सच में है? यह उन तमाम अनकहे, अंदरूनी संघर्षों को बयां करता है, जिन्हें हम दुनिया को दिखा नहीं पाते। यह एक तरह का आत्म-संवाद है!

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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल | Sukhan AI