ग़ज़ल
गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है
گلشن کو تری صحبت ازبسکہ خوش آئی ہے
यह ग़ज़ल महबूब की उपस्थिति को इतना सुखद बताती है कि प्रकृति भी प्रसन्न होकर उसका आलिंगन करती है। यह महबूब की उच्च उपेक्षा और प्रेमी के लगातार कराहों के बीच के विरोधाभास को दर्शाती है, जो आश्चर्यजनक रूप से उन तक पहुँचने का दावा करते हैं। अंततः, कविता बताती है कि गहरा ग़म संयम और शुद्धि सिखाता है, जो दिल की धूल और दागों को स्पष्टता और अंतर्दृष्टि के माध्यम में बदल देता है।
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1
गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है
हर ग़ुंचे का गुल होना आग़ोश-कुशाई है
बगीचे को आपकी संगति इतनी प्रिय लगी है कि हर कली का फूल बनना उसके आलिंगन को खोलना है।
2
वाँ कुंगुर-ए-इस्तिग़्ना हर-दम है बुलंदी पर
याँ नाले को और उल्टा दावा-ए-रसाई है
वहाँ बेपरवाही का बुर्ज हमेशा ऊँचाई पर है। यहाँ, इसके विपरीत, फ़रियाद उस तक पहुँचने का दावा करती है।
3
अज़-बस-कि सिखाता है ग़म ज़ब्त के अंदाज़े
जो दाग़ नज़र आया इक चश्म-नुमाई है
क्योंकि ग़म सहने के बहुत से तरीके सिखाता है, इसलिए जो भी दाग़ दिखाई देता है, वह केवल एक क्षणिक झलक है।
4
आईना-नफ़स से भी होता है कुदूरत कुश
'आशिक़ को ग़ुबार-ए-दिल इक वज्ह-ए-सफ़ाई है
आईना-रूप आत्मा से भी मैल दूर होता है। आशिक़ के लिए दिल का ग़ुबार ही पवित्रता का एक कारण है।
5
हंगाम-ए-तसव्वुर हों दरयूज़ा-गर-ए-बोसे
ये कासा-ए-ज़ानू भी इक जाम-ए-गदाई है
कल्पना के क्षणों में, मैं चुंबनों का भिखारी बन जाऊँ। यह घुटनों का कटोरा भी एक भिखारी का प्याला है।
6
वो देख के हसन अपना मग़रूर हुआ 'ग़ालिब'
सद जल्वा-ए-आईना यक सुब्ह-ए-जुदाई है
ग़ालिब, वह अपनी सुंदरता देखकर अहंकारी हो गया। सौ बार आईने में देखना जुदाई की एक सुबह के बराबर है।
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