ग़ज़ल
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
گلہ ہے شوق کو دل میں بھی تنگئِ جا کا
यह ग़ज़ल कवि के गहरे दुःख और हृदय की सीमाओं के भीतर भी अतृप्त इच्छाओं को व्यक्त करती है। वह दुनियावी सुखों की व्यर्थता पर शोक व्यक्त करते हैं, वसंत को पतझड़ के अस्थायी श्रृंगार के समान बताते हैं और वियोग के दर्द में डूबे होने पर बाग़ में टहलने जैसे सतही आनंदों को नकारते हैं। अपनी प्रेमिका की प्रतिक्रियाहीनता को जानने के बावजूद, कवि अपनी पीड़ा को लेखन के माध्यम से व्यक्त करने की प्रेरणा से बंधे हुए हैं।
Source: rekhta · HI
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1
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
गुहर में महव हुआ इज़्तिराब दरिया का
मेरे शौक़ को दिल में भी जगह की कमी का गिला है, जैसे दरिया का सारा इज़्तिराब एक मोती में समा गया हो।
2
ये जानता हूँ कि तू और पासुख़-ए-मकतूब
मगर सितम-ज़दा हूँ ज़ौक़-ए-ख़ामा-फ़रसा का
मैं जानता हूँ कि तुम और पत्र का जवाब मिलना असंभव है। फिर भी, मुझे लिखने की इच्छा ने सता रखा है।
3
हिना-ए-पा-ए-ख़िज़ाँ है बहार अगर है यही
दवाम-ए-कुल्फ़त-ए-ख़ातिर है ऐश दुनिया का
यदि यही बहार है, तो यह पतझड़ के पैरों की मेहंदी है। दुनिया के सुख हृदय के लिए स्थायी कष्ट का कारण हैं।
4
ग़म-ए-फ़िराक़ में तकलीफ़-ए-सैर-ए-बाग़ न दो
मुझे दिमाग़ नहीं ख़ंदा-हा-ए-बेजा का
विरह के दुःख में मुझे बाग़ घूमने की तकलीफ़ न दो। मुझे व्यर्थ की हँसी में कोई रुचि नहीं है।
5
हनूज़ महरमी-ए-हुस्न को तरसता हूँ
करे है हर-बुन-ए-मू काम चश्म-ए-बीना का
मैं अभी भी हुस्न की महरमी (निकटता) को तरसता हूँ, जबकि मेरे शरीर का हर बाल एक देखने वाली आँख का काम करता है।
6
दिल उस को पहले ही नाज़-ओ-अदा से दे बैठे
हमें दिमाग़ कहाँ हुस्न के तक़ाज़ा का
हमने अपना दिल पहले ही उसकी अदाओं और नखरों पर कुर्बान कर दिया था। हमें सौंदर्य की माँगों पर विचार करने की फुर्सत कहाँ थी?
7
न कह कि गिर्या ब-मिक़दार-ए-हसरत-ए-दिल है
मिरी निगाह में है जम-ओ-ख़र्च दरिया का
यह मत कहो कि रोना दिल की हसरत के माप के अनुसार है। मेरी निगाह में तो मैं दरिया के पूरे जमा और खर्च, यानी उसके बहाव को जानता हूँ।
8
फ़लक को देख के करता हूँ उस को याद 'असद'
जफ़ा में उस की है अंदाज़ कार-फ़रमा का
असद, मैं आकाश को देखकर उसे याद करता हूँ। उसकी ज़्यादती में भी एक शक्तिशाली शासक का अंदाज़ है।
9
मिरा शुमूल हर इक दिल के पेच-ओ-ताब में है
मैं मुद्दआ हूँ तपिश-नामा-ए-तमन्ना का
मेरी उपस्थिति हर दिल के पेच-ओ-ताब में है। मैं ही तमन्ना के प्रज्वलित पत्र का उद्देश्य हूँ।
10
मिली न वुसअ'त-ए-जौलान यक जुनूँ हम को
अदम को ले गए दिल में ग़ुबार सहरा का
हमें अपने एक भी जुनून को व्यक्त करने का अवसर नहीं मिला। इसलिए, हम अधूरी इच्छाओं की रेगिस्तानी धूल को अपने दिल में लेकर अदम तक चले गए।
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