ग़ज़ल

घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर

گھر جب بنا لیا ترے در پر کہے بغیر
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: बग़ैर

यह ग़ज़ल एक प्रेमी की गहरी, अनकही भक्ति को दर्शाती है, जिसने बिना कुछ कहे महबूब के दर पर अपना घर बना लिया है। इस मौन समर्पण के बावजूद, महबूब उसकी उपस्थिति या भावनाओं से अनभिज्ञ रहता है। शायर एक ज़ालिम महबूब के प्रति अपने गहन, अव्यक्त प्रेम को व्यक्त करता है, जो प्रेमी की बेबसी और परम निष्ठा को उजागर करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर जानेगा अब भी तू न मिरा घर कहे बग़ैर
मैंने तुम्हारे दर पर बिना कुछ कहे अपना ठिकाना बना लिया है। क्या तुम अब भी इसे मेरा घर नहीं पहचानोगे जब तक मैं स्पष्ट रूप से न कहूँ?
2
कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त-ए-सुख़न जानूँ किसी के दिल की मैं क्यूँकर कहे बग़ैर
लोग कहते हैं कि जब मुझमें बोलने की शक्ति नहीं रही, तो मैं किसी के दिल की बात बिना कहे कैसे जान सकता था?
3
काम उस से आ पड़ा है कि जिस का जहान में लेवे न कोई नाम सितमगर कहे बग़ैर
मेरा काम अब ऐसे व्यक्ति से आ पड़ा है जिसका नाम दुनिया में कोई भी 'सितमगर' कहे बिना नहीं लेता।
4
जी में ही कुछ नहीं है हमारे वगरना हम सर जाए या रहे न रहें पर कहे बग़ैर
हमारे दिल में ऐसी कोई इच्छा नहीं है, अन्यथा हम अपनी बात अवश्य कहते, चाहे हमारा सर चला जाए या हम रहें न रहें।
5
छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर
मैं उस काफ़िर बुत की पूजा नहीं छोड़ूँगा, भले ही दुनिया मुझे काफ़िर कहे बिना न छोड़े।
6
मक़्सद है नाज़-ओ-ग़म्ज़ा वले गुफ़्तुगू में काम चलता नहीं है दशना-ओ-ख़ंजर कहे बग़ैर
मक़्सद भले ही नाज़ और ग़म्ज़ा हो, लेकिन बातचीत में काम दशना और ख़ंजर का ज़िक्र किए बग़ैर आगे नहीं बढ़ता।
7
हर चंद हो मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगू बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर
भले ही सत्य के साक्षात्कार पर चर्चा हो, लेकिन शराब और प्याले का ज़िक्र किए बिना यह बात पूरी नहीं होती।
8
बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात सुनता नहीं हूँ बात मुकर्रर कहे बग़ैर
मैं बहरा हूँ, इसलिए आपकी कृपा दोगुनी होनी चाहिए। मैं कोई भी बात तब तक नहीं सुनता जब तक उसे बार-बार न कहा जाए।
9
'ग़ालिब' न कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़ ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर
ऐ ग़ालिब, उनकी उपस्थिति में बार-बार अपनी विनती न करो। तुम्हारी हालत उन पर तुम्हारे कहे बिना ही सब ज़ाहिर है।
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