ग़ज़ल
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
گر تجھ کو ہے یقینِ اجابت دعا نہ مانگ
यह ग़ज़ल निश्चितता या इच्छा से की गई प्रार्थना के विरुद्ध सलाह देती है, यह सुझाते हुए कि सच्ची आस्था को शायद मांगने की आवश्यकता नहीं होती, या एक इच्छा-रहित हृदय सर्वोपरि है। यह शायर के गहरे आंतरिक कष्ट और पश्चाताप को दर्शाती है, ईश्वर से प्रार्थना करती है कि जब हृदय अधूरी इच्छाओं के अनगिनत दाग़ लिए हुए हो, तब पापों का हिसाब न मांगा जाए। अंततः, यह एक ऐसी असाधारण भक्ति को चित्रित करती है जहाँ एक शहीद प्रेमी भी अपने प्रिय के सिवा कुछ नहीं चाहता।
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1
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
या'नी बग़ैर-ए-यक-दिल-ए-बे-मुद्दआ न माँग
अगर तुम्हें दुआ की क़ुबूलियत का यक़ीन है, तो दुआ मत माँगो। इसका मतलब है कि बिना किसी इच्छा से खाली दिल के दुआ मत माँगो।
2
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
मुझे अपने दिल की हसरतों के दाग़ों की गिनती याद आती है। ऐ ख़ुदा, मुझसे मेरे गुनाहों का हिसाब न माँग।
3
ऐ आरज़ू शहीद-ए-वफ़ा ख़ूँ-बहा न माँग
जुज़ बहर-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिल दुआ न माँग
हे आरज़ू, वफ़ा के शहीद, तुम ख़ून-बहा मत माँगो। कातिल के हाथ और बाज़ू के सिवा कोई और दुआ मत माँगो।
4
बरहम है बज़्म-ए-ग़ुंचा ब-यक-जुंबिश-ए-नशात
काशाना बस-कि तंग है ग़ाफ़िल हवा न माँग
एक खुशी की हलचल से कलियों की सभा बिखर जाती है। तुम्हारा घर इतना तंग है कि ऐ लापरवाह, हवा भी मत मांगो।
5
मैं दूर गर्द-ए-अर्ज़-ए-रुसूम-ए-नियाज़ हूँ
दुश्मन समझ वले निगह-ए-आशना न माँग
मैं औपचारिक विनम्र प्रार्थनाओं की धूल से दूर हूँ। मुझे दुश्मन समझो, लेकिन परिचित नज़रें न माँगो।
6
यक-बख़्त औज नज़्र-ए-सुबुक-बारी-ए-'असद'
सर पर वबाल-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा न माँग
असद, तुम्हारी ऊँची किस्मत तुम्हारी हलकेपन की भेंट हो। अपने सर पर हुमा के पंख के साये का बोझ मत माँगो।
7
गुस्ताख़ी-ए-विसाल है मश्शाता-ए-नियाज़
या'नी दुआ ब-जुज़ ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-दुता न माँग
मिलन की गुस्ताख़ी नम्रता की शृंगारक है। यानी, प्रार्थना में दोहरी जुल्फ़ों के घुमाव के सिवा कुछ और न माँगो।
8
ईसा तिलिस्म हुस्न तग़ाफ़ुल है ज़ीनहार
जुज़ पुश्त चश्म नुस्ख़ा अर्ज़ दवा न माँग
हे ईसा, सावधान रहो, सौंदर्य का जादू सिर्फ़ उपेक्षा है। आँखों के फेर लेने (या उपेक्षा) के अलावा किसी दवा का नुस्ख़ा मत माँगो।
9
नज़्ज़ारा दीगर-ओ-दिल-ए-ख़ूनीं नफ़स दिगर
आईना देख जौहर-ए-बर्ग-ए-हिना न माँग
बाहरी दृश्य कुछ और है और दिल की खूनी साँसें कुछ और। आईना देखकर मेंहदी के पत्ते का असली सार न माँगो।
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