सुब्ह मौज नसीम गुलशन को — दाग़ देहलवी

सुब्ह मौज नसीम गुलशन को नफ़स-ए-जाँ-फ़ज़ा दिया तू ने

“To the morning breeze through the garden, / You gave a soul-reviving breath.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

तूने सुबह के समय बाग़ में चलने वाली हवा के झोंके को जीवन प्रदान करने वाली सांस दी।

विस्तार

इस शेर में शायर बड़े ही अक़ीदत या मुहब्बत भरे अंदाज़ में महबूब (या खुदा) की शान बयान कर रहा है। वह कहता है कि बाग़ में सुबह-सवेरे बहने वाली ठंडी हवा में जो ज़िंदगी बख्शने वाली ताज़गी है, वो भी दरअसल तेरी ही सांसों का नूर है। यहाँ यह ख़ूबसूरत एहसास छिपा है कि कुदरत की हर ताज़गी और हर रूह-परवर अहसास उसी अज़ीम ज़ात के दम से ज़िंदा है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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