कब किसी दर की जब्हा-साई की — दाग़ देहलवी
“When has he ever bowed his brow upon a beloved's threshold? What could the pious Sheikh truly know of prayer?”
अर्थ
शेख़ साहब ने कभी किसी की चौखट पर अपना माथा नहीं टेका, फिर वे नमाज़ की हक़ीक़त क्या जानें।
विस्तार
उर्दू शायरी में अक्सर दिखावे वाली इबादत के मुक़ाबले आशिक़ के सच्चे समर्पण को ऊँचा दर्जा दिया जाता है। शायर यहाँ बड़े प्यार और चुटकीले अंदाज़ में कहता है कि नमाज़ महज़ रस्म अदायगी नहीं, बल्कि इश्क़ में अपनी 'अना' को मिटाकर किसी चौखट पर दिल से सर झुका देना है। चूँकि शैख़ साहब ने कभी इश्क़ की शिद्दत और समर्पण को जाना ही नहीं, इसलिए वे इबादत की रूह और उसके असली मर्म से अनजान हैं।
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