मंज़िल-ए-शौक़ तय नहीं होती — दाग़ देहलवी
“The destination of yearning is never traversed; the frail pause to lean upon supports at every turn.”
अर्थ
इश्क़ और शौक़ की मंज़िल कभी पूरी तरह तय नहीं हो पाती, क्योंकि कमज़ोर मुसाफ़िर रास्ते में बार-बार टेक या सहारे लेते रहते हैं।
विस्तार
इश्क़ और आरज़ू की राह इतनी असीम और कठिन है कि उसकी मंज़िल कभी पूरी तरह हासिल नहीं होती। इस शेर में शायर ने उन कमज़ोर और थके हुए मुसाफ़िरों का बेहद मार्मिक चित्र खींचा है, जिनके पैर जवाब दे जाते हैं और वे हर मोड़ पर सुस्ताने के लिए सहारा ढूँढते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि इंसान का हौसला चाहे कितना भी बड़ा हो, उसका जिस्म नाज़ुक है और चाहत का यह सफ़र कभी न ख़त्म होने वाली आज़माइश है।
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