मिसाल-ए-गंज-ए-क़ारूँ अहल-ए-हाजत से नहीं छुपता — दाग़ देहलवी

मिसाल-ए-गंज-ए-क़ारूँ अहल-ए-हाजत से नहीं छुपता जो होता है सख़ी ख़ुद ढूँड कर साइल से मिलता है

“Like the fabled hoard of Qarun, it hides not from the eyes of need; the truly generous seeks the petitioner out, and goes to meet him himself indeed.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

सच्चा दानी व्यक्ति कारूँ के ख़ज़ाने की तरह ज़रूरतमंदों से छिपता नहीं है, बल्कि वह ख़ुद माँगने वाले को ढूँढकर उससे मिलता है।

विस्तार

शायर यहाँ दौलत के दिखावे और सच्ची उदारता के बीच का सुंदर फ़र्क़ समझा रहे हैं। क़ारूँ का गड़ा हुआ असीम ख़ज़ाना भी ज़रूरतमंदों की नज़रों से छुप नहीं पाता, मगर जो इंसान दिल से सच्चा सख़ी होता है, वह किसी को अपनी चौखट पर गिड़गिड़ाने नहीं देता। वह ख़ुद तलाश करके ज़रूरतमंद तक पहुँचता है ताकि मदद भी हो जाए और लेने वाले का आत्मसम्मान भी महफ़ूज़ रहे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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