ब-ज़ाहिर बा-अदब यूँ हज़रत-ए-नासेह से मिलता हूँ — दाग़ देहलवी
“Outwardly with such deep respect the preacher wise I greet, as when a true disciple goes his perfect guide to meet.”
अर्थ
दिखावे के तौर पर मैं उपदेशक से इतने अदब और आदर के साथ मिलता हूँ, जैसे कोई ख़ास मुरीद अपने सिद्ध गुरु (कामिल पीर) से मिलता है।
विस्तार
इस शेर में एक बहुत ही खूबसूरत और मीठा तंज़ (व्यंग्य) छिपा है। शायर कहता है कि वह नसीहत देने वाले 'नासेह' से दिखने में तो इतने अदब से मिलता है जैसे कोई मुरीद अपने कामिल पीर-ओ-मुर्शिद के कदमों में झुका हो। लेकिन सारा राज़ 'ब-ज़ाहिर' यानी दिखावे के लफ़्ज़ में है—अंदर से वह नासेह की नसीहतों को ज़रा भी तवज्जो नहीं देता, बस दुनियादारी निभाने और शायद उसका मज़ाक उड़ाने के लिए यह शराफ़त का नाटक करता है।
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