समझता है तू 'दाग़' को रिंद ज़ाहिद — दाग़ देहलवी
“You deem Dagh a mere libertine, O ascetic devout, yet the libertines revere him as a saint beyond doubt.”
अर्थ
ऐ ज़ाहिद, तू दाग़ को सिर्फ़ एक शराबी या गुनाहगार समझता है, लेकिन शराब पीने वाले (रिंद) खुद उन्हें एक वली या संत मानते हैं।
विस्तार
दाग़ यहाँ ज़ाहिद यानी दिखावटी पाखंडी और रिंद यानी मस्त-मौला प्रेमी के फ़र्क़ को बड़ी ख़ूबसूरती से उभारते हैं। ज़ाहिद अपनी संकीर्ण सोच के कारण दाग़ को केवल एक भटका हुआ शराबी समझता है, जबकि सच्चाई की परख रखने वाले रिंद उन्हें एक पहुँचे हुए संत का दर्जा देते हैं। यह शे'र खोखले ढोंग पर एक मीठी चोट है, जो यह याद दिलाता है कि असली रूहानियत पाखंडी नियमों में नहीं, बल्कि दिल के सच्चे समर्पण और बेख़ुदी में होती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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