“What business have wine-drinkers in the house of God, O priest? Those who find no wine may yet thirst for Zamzam's holy stream.”
हे ज़ाहिद! तुम क्यों पूछते हो कि ख़ुदा के घर में शराबियों का क्या काम है? जिन्हें शराब नहीं मिलती, वे ज़मज़म के पवित्र जल के भी प्यासे होते हैं।
शायर यहाँ जाहिद यानी धर्मगुरु के इस वहम पर गहरी चोट कर रहे हैं कि ख़ुदा के घर पर सिर्फ़ कथित तौर पर नेक लोगों का हक़ है। वे कहते हैं कि असली चीज़ दिल की 'प्यास' है; जिसे दुनियावी शराब नहीं मिली, वह भी मुक़द्दस आब-ए-ज़मज़म का तलबगार हो सकता है। यह शेर बतलाता है कि रहमत का दरवाज़ा सबके लिए खुला है और सच्ची तड़प रखने वाले किसी भी इंसान को रब की चौखट से बेदख़ल नहीं किया जा सकता।
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