तबीअत की कजी हरगिज़ मिटाए से नहीं मिटती कभी सीधे तुम्हारे गेसू-ए-पुर-ख़म भी होते हैं

“The crookedness of inherent nature can never be erased; could the twisted curls of your tresses ever become straight?”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

स्वभाव का टेढ़ापन मिटाने से कभी नहीं मिटता, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी अत्यधिक घुंघराली ज़ुल्फ़ें कभी सीधी नहीं हो सकतीं।

विस्तार

शायर यहाँ महबूब की शोख़ी और ज़िद पर एक प्यार भरी चुटकी ले रहा है। वह कहता है कि इंसान की मूल फितरत को कभी बदला नहीं जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे महबूब की घुंघराली और बलखाती ज़ुल्फ़ों को लाख सुलझाने पर भी सीधा नहीं किया जा सकता। यह शेर फ़ितरत की सच्चाई को ज़ुल्फ़ों के हुस्न के साथ बेहद नज़ाकत और अपनेपन से बयां करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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