इंसान को है ख़ाना-ए-हस्ती में लुत्फ़ क्या मेहमान आइए तो पशेमान जाइए

“What pleasure can man ever find in this house of existence? Arrive as an honored guest, only to depart filled with regret.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

इस ज़िंदगी या संसार के घर में इंसान के लिए क्या मज़ा है? यहाँ इंसान एक मेहमान की तरह आता है और पछतावा लेकर वापस जाता है।

विस्तार

शायर ने इस दुनिया यानी 'ख़ाना-ए-हस्ती' की तुलना एक ऐसे मेज़बान के घर से की है जहाँ इंसान बड़े शौक और उम्मीदों के साथ मेहमान बनकर आता है। लेकिन ज़िंदगी का कड़वा सच यह है कि यहाँ का साज़-ओ-सामान और ताल्लुक़ात सब आरज़ी हैं, और रुख़सत के वक़्त सिर्फ़ अधूरी हसरतें और पछतावा ही हाथ लगता है। यह शेर बड़ी सादगी से सवाल करता है कि जिस घर से आख़िरकार मायूस होकर ही लौटना हो, वहाँ ठहरने का भला क्या मज़ा?

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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