“What deep mistrust she harbors! I have been strictly commanded: / Do not go, not even as a guest, into the very house of God.”
उन्हें मुझ पर इस कदर बदगुमानी और शक है कि मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं मेहमान बनकर भी ख़ुदा के घर न जाऊँ।
इस ख़ूबसूरत शेर में आशिक़ अपनी महबूबा के बेपनाह शक और जलन का बड़े चुटीले अंदाज़ में ज़िक्र कर रहा है। महबूबा को उस पर इस क़दर बदगुमानी है कि उसने आशिक़ को किसी के भी यहाँ जाने से मना कर दिया है, यहाँ तक कि ख़ुदा के घर में भी मेहमान बनने पर पाबंदी लगा दी है। यह महबूब के बेइंतहा हक़ जताने और पोज़ेसिव मिज़ाज की एक बड़ी प्यारी सी अतिशयोक्ति है, जहाँ मोहब्बत का शक इबादतगाहों तक जा पहुँचता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
