अच्छी कही कि ग़ैर के घर तक ज़रा चलो मैं आप का नहीं हूँ निगहबान जाइए

“A fine suggestion, that I walk you to the rival's door! I am no guardian of yours—go on then, take your leave.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

खूब कही आपने कि मैं आपके साथ ग़ैर के घर तक चलूँ। मैं आपका कोई निगहबान या पहरेदार नहीं हूँ, आप खुद ही जाइए।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ का तीखा तंज़ और उसकी गहरी चोट साफ़ झलकती है, जब महबूब उसी से रक़ीब यानी ग़ैर के घर तक साथ चलने को कहता है। आशिक़ अपने टूटे हुए दिल के दर्द को बनावटी ग़ुस्से के पीछे छुपाते हुए कहता है कि 'वाह, क्या बात कही! मैं आपका कोई पहरेदार नहीं हूँ, शौक़ से जाइए।' यह शेर बेबसी, जलन और स्वाभिमान के बीच झूलते एक आहत प्रेमी का बहुत सच्चा और इंसानी इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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