ग़ज़ल

घुंघट ओहले ना लुक सजना

گھنگھٹ اوہلے نہ لک سجنا
बुल्ले शाह· Ghazal· 4 shers

यह ग़ज़ल एक प्रेम भरी पुकार है जिसमें शायर अपने प्रियतम से कहता है कि वह अपना घूंघट न ओढ़े, ताकि वह उसे देख सके। शायर अपनी विरह वेदना और प्रेम की तीव्रता व्यक्त करता है, और अपने प्रिय के प्रेम में पागल होने की बात कहता है। यह प्रेम की निश्छल और उत्कट अभिव्यक्ति है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
گھنگھٹ اوہلے نہ لک سجنا میں مشتاق دیدار دی ہاں
घुंघट ओहले ना लुक सजना मैं मुश्ताक़ दीदार दी हां
घूंघट से तुम्हारी सुंदरता नहीं छिप सकती, मेरे प्रिय, मैं तुम्हारे चेहरे को देखने के लिए बेचैन हूँ।
2
تیرے باجھ دیوانی ہوئی ٹوکاں کردے لوک سبھوئی جے کر یار کرے دلجوئی تاں فریاد پکار دی ہاں
तेरे बाझ दीवानी होई टोकां करदे लोक सभोई जे कर यार करे दिलजोई तां फ़रियाद पुकार दी हां
तेरे बजह दीवानी होई, टोकाँ कड़ै लूक सब्होई। जेकर यार कड़ै दिलजोई, तां फ़रियाद पुकार दे हाँ।
3
مفت وکاندی جاندی باندی مل ماہی جند ایویں جاندی اک دم ہجر نہیں میں سہندی بلبل میں گلزار دی ہاں
मुफ़्त विकांदी जांदी बांदी मिल माही जिंद ऐवें जांदी इक दम हिज्र नहीं मैं सहंदी बुलबुल मैं गुलज़ार दी हां
बाजार की दुकानें बंद हैं और औरत घूंघट में है; प्रिय से मिले बिना मेरी जान यूं ही जा रही है। मैं एक पल भी यह बिछोह सह नहीं सकती; मैं बगीचे की बुलबुल हूँ।
4
بلھے شاہ اوہ کون اتم تیرا یار اوس دے ہتھ قرآن ہے اوسے گل زنار
बुल्हे शाह ओह कौन उत्तम तेरा यार उस दे हथ क़ुरआन है उसे गल ज़ुन्नार
बुल्ले शाह, अरे, तुम कितने प्यारे दोस्त हो; / और तुम्हारे हाथ में कुरान है, अरे, प्यारे फूल।
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