“Though crescent and full moon share one same light in kind, / What glows within the flawed soul is transformed in the perfected mind.”
यद्यपि नए चाँद और पूरे चाँद में एक ही रोशनी होती है, लेकिन जो नूर किसी अपूर्ण व्यक्ति के दिल में होता है, वह एक परिपूर्ण व्यक्ति के दिल में बिल्कुल अलग होता है।
ज़रा सोचिए, नया चाँद (हिलाल) और पूरा चाँद (बद्र) दोनों एक ही सूरज की धूप से चमकते हैं, फिर भी दोनों का असर कितना अलग होता है। शायर इसी खूबसूरत मिसाल से समझाते हैं कि हक़ीक़त और रूहानियत का नूर तो सबके लिए एक जैसा है, मगर वह किसके दिल में कितना उतरता है, यह उस दिल के मुक़ाम पर तय होता है। एक नासमझ या अधूरे इंसान के दिल में वह नूर सिर्फ़ एक हल्की सी झलक बनकर रह जाता है, जबकि किसी परिपक्व और सिद्ध पुरुष (कामिल) के दिल में वही नूर पूरी आब-ओ-ताब के साथ जगमगा उठता है।
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