दिया अपनी ख़ुदी को जो हम ने उठा वो जो पर्दा सा बीच में था न रहा रहे पर्दे में अब न वो पर्दा-नशीं कोई दूसरा उस के सिवा न रहा

“Once I cast aside the veil of my own self, that divide between us was no more; no longer hidden stays the Veiled Beloved, for none remains now save the One.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

जब मैंने अपने अहंकार (ख़ुदी) को मिटा दिया, तो हमारे बीच का पर्दा हट गया। अब वह परदे में रहने वाला महबूब भी छिपा नहीं रहा, क्योंकि उसके सिवा कोई दूसरा बचा ही नहीं है।

विस्तार

यह खूबसूरत शेर सूफ़ी दर्शन के उस गहरे राज़ को खोलता है, जहाँ इंसान और ईश्वर के बीच की सबसे बड़ी दीवार उसकी अपनी 'ख़ुदी' यानी अहंकार होती है। शायर कहते हैं कि जैसे ही हमने अपने 'मैं' के वजूद को मिटा दिया, तो हमारे और महबूब के दरमियान पड़ा हुआ पर्दा भी हमेशा के लिए हट गया। जब द्वैत का यह भरम टूटता है, तो वही हक़ीक़ी महबूब हर जगह नज़र आने लगता है और उसके सिवा कायनात में कुछ बाकी नहीं रहता।

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