कुछ ऐसा हो कि जिस से मंज़िल-ए-मक़्सूद को पहुँचूँ तरीक़-ए-पारसाई होवे या हो राह-ए-रिंदाना

“Let something happen so that I might reach my cherished goal—be it the path of austere piety, or the libertine's wayward stroll.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

कुछ ऐसा हो जिससे मैं अपने अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकूँ, चाहे वह रास्ता परहेज़गारी का हो या मस्त और बेफ़िक्र लोगों का।

विस्तार

इस शेर में शायर अपनी असली मंज़िल यानी रूहानी सुकून या महबूब तक पहुँचने की बेताब तड़प बयां कर रहा है। उसे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं कि रास्ता संयम और परहेज़गारी (पारसाई) का हो या फिर मस्त-मलंगों और आवारों (रिंदाना) का। सूफ़ियाना मिज़ाज का यह शेर हमें समझाता है कि जब मंज़िल से सच्चा इश्क़ हो, तो ज़ाहिरी रास्ते और समाज के बनाए उसूल बेमानी हो जाते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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