जब कहते हैं कुछ बात रुकावट की तिरे हम रुक जाता है ये सीने में दम कह नहीं सकते

“Whenever I try to speak of your hesitation, the breath halts within my chest—I cannot speak.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

जब भी हम तुम्हारी किसी रुकावट या झिझक की बात करना चाहते हैं, तो हमारे सीने में साँस अटक जाती है और हम कुछ कह नहीं पाते हैं।

विस्तार

शायर यहाँ 'रुकावट' के लफ़्ज़ से एक बेहद हसीन खेल रचते हैं—एक तरफ़ महबूब की झिझक है और दूसरी तरफ़ आशिक़ की रुकती हुई साँस। जब भी वे महबूब के तग़ाफ़ुल या हिचकिचाहट का शिकवा करना चाहते हैं, तो जज़्बातों की शिद्दत और दिल के ख़ौफ़ से उनकी अपनी ही साँस सीने में अटक जाती है। यह शेर उस ख़ामोश बेबसी की तस्वीर है, जहाँ शिकायत होंठों तक आने से पहले ही दम घुटने में बदल जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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