दीं दे के गया कुफ़्र के भी काम से आशिक़ तस्बीह के साथ उस ने तो ज़ुन्नार भी छोड़ा

“Having surrendered faith, the lover was useless even to heresy; along with the rosary, he cast away the sacred thread as well.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

आशिक़ अपना धर्म छोड़कर कुफ़्र (अधर्म) के भी किसी काम का न रहा; उसने तस्बीह (माला) छोड़ने के साथ-साथ ज़ुन्नार (जनेऊ) भी त्याग दिया।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ की उस बेख़ुदी का ख़ूबसूरत बयान है जहाँ इश्क़ हर तयशुदा दायरे को मिटा देता है। उसने मज़हब को छोड़ा तो लगा कि शायद वह कुफ़्र या बग़ावत की राह चुनेगा, लेकिन उसने तस्बीह के साथ-साथ ज़ुन्नार (जनेऊ) को भी त्याग दिया। आशिक़ अब न दीन का रहा न दुनिया का; इश्क़ ने उसे हर रस्म, पहचान और अक़ीदे से पूरी तरह आज़ाद कर दिया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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