ग़ज़ल

हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ

حقیقت محرم اسرار سے پوچھ
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 11 shers· radif: से पूछ

यह ग़ज़ल इस विचार को प्रस्तुत करती है कि किसी भी अनुभव की वास्तविक गहराई केवल वही जान सकता है जिसने उसे भोगा हो, जैसे शराब का मज़ा केवल मय-ख़्वार जानता है। शायर अपनी तन्हाई और असीम प्रेम की दास्तान बयां करते हुए कहता है कि उसकी वफ़ा और दर्द की सच्ची गवाह सिर्फ उसके घर की दीवारें हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ मज़ा अंगूर का मय-ख़्वार से पूछ
2
वफ़ा अग़्यार की अग़्यार से सुन मिरी उल्फ़त दर ओ दीवार से पूछ
3
हमारी आह-ए-बे-तासीर का हाल कुछ अपने दिल से कुछ अग़्यार से पूछ
4
दिलों में डालना ज़ौक़-ए-असीरी कमंद-ए-गेसू-ए-ख़मदार से पूछ
5
दिल-ए-महजूर से सुन लज़्ज़त-ए-वस्ल नशात-ए-आफ़ियत बीमार से पूछ
6
नहीं जुज़ गिर्या-ए-ग़म हासिल-ए-इश्क़ हमारी चश्म-ए-दरिया-बार से पूछ
7
नहीं आब-ए-बक़ा जुज़ जल्वा-ए-दोस्त किसी लब-तिश्ना-ए-दीदार से पूछ
8
फ़रेब-ए-वादा-ए-दिलदार की क़द्र शहीद-ए-ख़ंजर-ए-इंकार से पूछ
9
फ़ुग़ान-ए-शौक़ को माने नहीं वस्ल ये नुक्ता अंदलीब-ए-ज़ार से पूछ
10
तसव्वुर में किया करते हैं जो हम वो तस्वीर-ए-ख़याल-ए-यार से पूछ
11
मता-ए-बे-बहा है शेर-ए-'हाली' मिरी क़ीमत मिरी गुफ़्तार से पूछ
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हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ | Sukhan AI