“Who could ever truly pay the debt of loyalty to one in whose eyes cruelty itself is no cause of pain?”
उस इंसान की वफ़ादारी का हक़ भला कौन अदा कर सकता है, जिसके नज़दीक ज़ुल्म-ओ-सितम भी किसी तकलीफ़ का कारण नहीं होता।
यह शेर इश्क़ की उस बेमिसाल मंज़िल की बात करता है जहाँ चाहत बिल्कुल निस्वार्थ हो जाती है। शायर पूछता है कि उस आशिक़ की वफ़ा का मोल आख़िर कौन चुका सकता है, जिसके लिए महबूब का ज़ुल्म और बेरुख़ी भी तकलीफ़ की वजह नहीं बनती। जब कोई इंसान दर्द को भी बिना किसी शिकायत के इबादत समझकर अपना ले, तो उसकी वफ़ादारी का क़र्ज़ उतार पाना किसी के बस में नहीं होता।
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