यूँही गुज़रे तो सहल है लेकिन फ़ुर्सत-ए-ग़म को भी सबात नहीं

“If it passes like this, it is easy enough; yet even this respite of grief has no permanence.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

अगर ज़िंदगी यूँ ही गुज़र जाए तो आसान है, लेकिन ग़म की इस फ़ुर्सत को भी कोई स्थायित्व नहीं है।

विस्तार

शायर यहाँ ज़िन्दगी की एक बेहद नाज़ुक और गहरी कशमकश को बयां कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर ज़िन्दगी इसी धीमी उदासी और तन्हाई के सहारे कट जाए तो काटना आसान हो जाए, मगर दुख तो यह है कि ग़म मनाने की यह मोहलत भी हमेशा नहीं रहती। ज़िन्दगी का दस्तूर इतना बेदर्द है कि वह हमें अपने रंज के साथ सुकून से बैठने भी नहीं देती और नए इम्तिहान ले आती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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