ग़ज़ल

અખાજ્ઞાની ભયથી કે મ ડરે

અખાજ્ઞાની ભયથી કે મ ડરે
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

“अखा भगत ८” एक अनुभवी और ज्ञानी व्यक्ति के निडर स्वभाव को दर्शाता है, जिसकी अंतर्दृष्टि आकाश में विचरण करती है। यह आडंबरपूर्ण बातों और अज्ञानियों द्वारा अज्ञानियों के अंधानुकरण की निरर्थकता पर भी प्रकाश डालता है। अंत में, अखो इन व्यर्थ और सतही मामलों की गहरी समझ प्रस्तुत करते हैं।

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लिपि व अर्थ
1
અખાજ્ઞાની ભયથી કે મ ડરે જેની અનુભવ પાંખ આકાશે ફરે.
ज्ञानी अखा भला भय से क्यों डरे? जिसकी अनुभव रूपी पंख आकाश में विचरण करती है।
2
જોજો રે મોટાના બોલ ઉજડ ખેડે વાગ્યો ઢોલ;
महान लोगों के वचनों को देखो; एक वीरान खेत में ढोल बज रहा है।
3
અંધે અંધ અંધારે મળ્યા જેમ તલમાં કોદરા મળ્યા;
अंधे को अंधेरे में दूसरा अंधा मिला, ठीक वैसे ही जैसे तिल के दानों में बाजरा मिल गया हो।
4
ઘેંસ ન થાય ન થાય ઘાણી કહે અખો એ વાતો જાણી.
न तो पिसाई होगी और न ही तेल की घानी चलेगी। अखा यह बातें जानते हुए कहता है।
5
આંધળો સસરો ને સણગટ(ઘુંઘટમાં) વહુ એમ કથા સુણવા ચાલ્યું સહુ ;
एक अंधा ससुर और घूंघट में बहु; इस तरह सब कथा सुनने चले गए।
6
કહ્યું કાંઇને સમજ્યાં કશું આંખ્યનું કાજળ ગાલે ઘશ્યું;
कुछ और कहा गया था, पर कुछ और ही समझा गया; यह आँखों के काजल को गालों पर मलने जैसा है, जो गहरी गलतफहमी दर्शाता है।
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