ग़ज़ल

પોતે ટળ્યા વિના શા કામના

પોતે ટળ્યા વિના શા કામના
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल आत्म-साक्षात्कार के बिना ज्ञान की व्यर्थता पर ज़ोर देती है। इसमें कहा गया है कि केवल पढ़ना-लिखना भूलों को दूर नहीं करता; सच्चा ज्ञान 'जानने' के अहंकार को त्यागकर अपने मूल स्वरूप को पहचानने से आता है। तभी बाहरी ज्ञान की आवश्यकता समाप्त होती है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
પોતે ટળ્યા વિના શા કામના એતો અકૃ તે વધારી કામના;
स्वयं के मिटे बिना इच्छाएँ किस काम की? वे तो केवल व्यर्थ में कामनाएँ बढ़ाती हैं।
2
કહે અખો કાં ફોક્ટ ફુ લ ભણ્યા ગણ્યા પણ ન ટળી ભૂલ.
अखो कहते हैं कि यह व्यर्थ का दिखावा क्यों, जब इतनी पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान के बावजूद भी अपनी भूल नहीं मिटती।
3
ભણ્યા ગણ્યા તો તે પરમાણ જો જાણપણું ટાળીને જાણ;
जो कुछ तुमने पढ़ा और समझा है, वह उसी हद तक सत्य है, यदि तुम जानने का दिखावा छोड़कर जानो।
4
મૂળ સ્વરૂપે જે કોઇ થયો તેને ભણ્યાનો સ્વભાવ ગયો;
जो कोई अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, उसकी सीखने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है।
5
અખા એમ સમજ્યા તે મહં ત તેને સત્‌ચિત્‌આનંદ વદે વેદાંત.
अखा कहते हैं कि जो इसे समझते हैं, वे निश्चित रूप से महान संत हैं। वेदान्त उन्हें सच्चिदानन्द कहता है।
6
વેદાંતે વાત વિચારી અસી ને શ્રોતા વક્તા સમજ્યા જસી;
वेदांत में, हमने इस विषय पर विचार किया; और वक्ता तथा श्रोता ने भी इसे इसी प्रकार समझा।
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