પોતે ટળ્યા વિના શા કામના એતો અકૃ તે વધારી કામના;

“What good are desires, if the self is not gone?They only multiply cravings, to no good end.”

— अखा भगत
अर्थ

स्वयं के मिटे बिना इच्छाएँ किस काम की? वे तो केवल व्यर्थ में कामनाएँ बढ़ाती हैं।

विस्तार

यह गहरा दोहा पूछता है कि अगर हमने पहले अपने भीतर के 'स्व' या अहंकार पर विजय प्राप्त नहीं की है, तो बाकी सब किस काम का? यह दर्शाता है कि अपनी आंतरिक बाधाओं और आसक्तियों को दूर किए बिना, हमारे सभी बाहरी प्रयास व्यर्थ हैं। वास्तव में, यदि हम अपनी अंदरूनी इच्छाओं और स्वार्थ को नहीं संभालते, तो हमारे कर्म केवल और अधिक इच्छाओं का अंतहीन विस्तार करते हैं। सच्ची संतुष्टि और जीवन का उद्देश्य अधिक जमा करने से नहीं, बल्कि उन इच्छाओं को जन्म देने वाले 'मैं' और 'मेरा' की भावना से ऊपर उठने में है। यह आत्म-ज्ञान को किसी भी सार्थक कार्य का आधार मानने का आह्वान है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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