ग़ज़ल

ઉંચમાં રામ બમણો નથી ભર્યો

ઉંચમાં રામ બમણો નથી ભર્યો
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

“अखा भगत २३” में कवि अखा यह बताते हैं कि ईश्वर सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है, चाहे वे उच्च हों या निम्न। कवि अपने पूर्व भ्रम को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि वे सत्य को जैसा है वैसा देख नहीं पाए थे, और अब उन्हें ज्ञात है कि राजा हो या भिखारी, सभी में निहित चेतना उन्हें आध्यात्मिक रूप से एक करती है।

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लिपि व अर्थ
1
ઉંચમાં રામ બમણો નથી ભર્યો કીચ પિંડ ઠાલો નથી કર્યો;
ऊँचे में राम दोगुना नहीं भरा गया है, और न ही मिट्टी का पिंड (शरीर) खाली किया गया है।
2
કહે અખો સ્વપ્નામાં બક્યો જેમ છે તેમ જોઈ નવ શક્યો.
अखो कहते हैं कि मैं सपने में बड़बड़ाया, और मैं चीजों को वैसा नहीं देख पाया जैसी वे वास्तव में हैं।
3
એક જ્ઞાની ને બીજું નાવ તર્યા તર્યાનો બેને ભાવ;
एक ज्ञानी और एक नाव, दोनों को पार करने या पार लगाने का भाव होता है।
4
ભૂપતિ ભિખારી ગર્દભ ગાય ચેતન જાણી તાર્યા જાય;
राजा, भिखारी, गधे और गाय—इन सभी को चेतन जानकर उन्हें मोक्ष दिलाया जा सकता है।
5
આદ્ય અંત ન ગણે ને વહે અખા વસ્તુ વિચારે રહે .
यह न आदि को गिनता है न अंत को, और बहता रहता है। अखा, सार चिंतन में निवास करता है।
6
જાણપણમાં જાડા થયા ડહાપણ ડોળી રાબડ રહ્યા;
वे अपने ज्ञान में अहंकारी और अड़ियल हो गए, अपनी बुद्धिमत्ता बिखेर दी, और अंततः केवल निरर्थक सार ही शेष रह गया।
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