ग़ज़ल

બળદની તે કે મ થાય ગાય

બળદની તે કે મ થાય ગાય
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल, "अखा भगत १९", सच्चे ज्ञान के बिना किए गए प्रयासों की निरर्थकता पर प्रकाश डालती है, इसे मूर्ख के बैल को गाय में बदलने के व्यर्थ प्रयासों के समान बताती है। कवि ऐसे समाज की आलोचना करता है जहाँ वास्तविक ज्ञान की कमी है, जिसके कारण पूज्य गुरुजन भी पूर्णतः अंधे लोगों के बीच केवल "काणे" (एक-आँखों वाले) बनकर रह गए हैं। यह गहरी अंतर्दृष्टि की आवश्यकता पर जोर देती है ताकि सतही समझ से वास्तविक मार्गदर्शन को अलग किया जा सके।

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लिपि व अर्थ
1
બળદની તે કે મ થાય ગાય મૂરખ મિથ્યા કરે ઉપાય;
बैल कभी गाय कैसे बन सकता है? मूर्ख के सभी उपाय व्यर्थ ही होते हैं।
2
જ્ઞાનવિના તે સાધન એવા અખા તેમાં ન લેવાદે વા.
ज्ञान के बिना वे साधन ऐसे निरर्थक हैं, अखा कहते हैं कि उनमें कोई वास्तविक लेन-देन (आदान-प्रदान या फल) नहीं है।
3
સો અંધામાં કાણો રાવ આંધળાને કાણા પર ભાવ;
सौ अंधों में काना व्यक्ति राजा बन जाता है। अंधे लोग भी काने व्यक्ति को पसंद करते हैं और उस पर विश्वास करते हैं।
4
સૌનાં નેત્રો ફૂ ટિ ગયાં ગુરુ આચાર્યજ કાણા થયા;
सभी की आँखें फूट गईं, और गुरु आचार्य काने हो गए।
5
શાસ્ત્ર તણી છે એકજ આંખ્ય આ અનુભવની ઉઘડી નહિ ઝાંખ્ય.
शास्त्रों की तो बस एक ही आँख है, और अनुभव की यह दृष्टि अभी तक खुली नहीं है।
6
મુંડ મુંડાવી હરિને કાજ લોક પૂજે ને કહે મહારાજ;
हरि के लिए सिर मुंडवाने के बाद, लोग उनकी पूजा करते हैं और उन्हें 'महाराज' कहते हैं।
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