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જગતપ્રમોદી દાઝ ટળે કુ વાડામાંથી કાઢે જળે ;

A grudge, though from a soul who brightens every shore,Will not depart, like water drawn from a dry well's core.

अखा भगत
अर्थ

जगत को प्रसन्न करने वाले व्यक्ति का द्वेष भी नहीं टलता, जैसे सूखे कुएँ से जल नहीं निकलता।

विस्तार

यह दोहा उन लोगों के बारे में बात करता है जो सांसारिक सुखों और भौतिकवादी चीज़ों में गहराई से डूबे हुए हैं। यह बताता है कि उनकी अतृप्त इच्छाएं या भीतर की जलन, जैसे लालच या असंतोष, कभी शांत नहीं होती। भले ही आप उन्हें आराम दें, बचाएं, या उनकी तत्काल ज़रूरतों को पूरा करें – जैसे कुएं से बाहर निकालना – उनकी अंतर्निहित चाह या असंतोष बना रहता है। यह इस विचार पर ज़ोर देता है कि सच्ची संतुष्टि बाहरी चीज़ों से नहीं मिलती, बल्कि भीतर से आती है, और एक सुख-प्रेमी की अधिक पाने की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती, चाहे उन्हें कुछ भी क्यों न दिया जाए।

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