न कोई तकरीम-ए-बाहमी है न प्यार बाक़ी है अब दिलों में ये सिर्फ़ तहरीर में डियर सर है या जनाब-ए-मुकर्रमी है

“No mutual reverence remains, no love endures within the heart; It is only in formal text where 'Dear Sir' or 'Esteemed Sir' plays its part.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

अब दिलों में न तो आपसी सम्मान बचा है और न ही प्यार; यह केवल लिखावट तक ही सीमित रह गया है जहाँ 'डियर सर' या 'जनाब-ए-मुकर्रमी' लिखा जाता है।

विस्तार

यह शेर आधुनिक रिश्तों के खोखलेपन और औपचारिकता पर गहरी चोट करता है। शायर बड़ी सादगी से कहता है कि अब दिलों से सच्चा प्यार और आपसी सम्मान तो ग़ायब हो चुका है, बस काग़ज़ों और चिट्ठियों में रस्मी तहज़ीब बची है। 'डियर सर' और 'जनाब-ए-मुकर्रमी' जैसे भारी-भरकम शब्द अब जज़्बात का नहीं, बल्कि बेदिली और केवल दिखावे का प्रतीक बनकर रह गए हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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