इक़बाल मुसाइद जब न रहा रक्खे ये क़दम जिस मंज़िल में अश्जार से साया दूर हुआ चश्मों ने उबलना छोड़ दिया

“When fortune ceased to favor me, wherever my steps were laid, the springs refused to bubble forth, the trees withdrew their shade.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

जब भाग्य अनुकूल नहीं रहा, तो मैंने जिस भी मंज़िल में क़दम रखा, वहाँ पेड़ों से साया छिन गया और झरनों ने फूटना छोड़ दिया।

विस्तार

यह शेर बयां करता है कि जब इंसान की क़िस्मत रूठ जाती है, तो पूरी कायनात बेगानी लगने लगती है। शायर ने कुदरत के खूबसूरत बिंबों—पेड़ों की छांव और फूटते झरनों—के ज़रिए दिखाया है कि बदकिस्मती इंसान से ज़िंदगी की सबसे बुनियादी राहतें भी छीन लेती है। जहाँ-जहाँ वो मायूस होकर कदम रखता है, वहाँ सुकून के साए भी सिमट जाते हैं और ज़िंदगी वीराना बन जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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