बदली वो हवा गुज़रा वो समाँ वो राह नहीं वो लोग नहीं तफ़रीह कहाँ और सैर कुजा घर से भी निकलना छोड़ दिया

“That breeze has turned, that season passed, those paths and people are no more; What talk of strolls or pleasure now, I step no longer past my door.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

हवा का रुख़ बदल गया है, वह ज़माना बीत चुका है, और अब न वे रास्ते रहे और न वे लोग। ऐसे में मनोरंजन और सैर-सपाटे की तो बात ही क्या, मैंने अब घर से बाहर निकलना भी छोड़ दिया है।

विस्तार

यह शेर गुज़रे हुए सुनहरे दौर और बिछड़े हुए अपनों की गहरी उदासी को बहुत सादगी से बयान करता है। शायर महसूस करता है कि वक़्त के बदलने से न सिर्फ़ मौसम बदला, बल्कि वे जानी-पहचानी राहें और प्यारे लोग भी रुख़सत हो गए। जब बाहर की दुनिया से वह रौनक और अपने ही चले गए, तो दिल बहलाने या सैर करने का कोई मतलब नहीं बचा; यही अकेलापन इंसान को अपने ही घर में क़ैद कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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