क्यूँ किब्र-ओ-ग़ुरूर इस दौर पे है क्यूँ दोस्त फ़लक को समझा है
गर्दिश से ये अपनी बाज़ आया या रंग बदलना छोड़ दिया
— अकबर इलाहाबादी
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