जब सर में हवा-ए-ताअत थी सरसब्ज़ शजर उम्मीद का था जब सर-सर-ए-इस्याँ चलने लगी इस पेड़ ने फलना छोड़ दिया

“While the breeze of devotion stirred my soul, hope's tree was lush and green; When the biting gale of sin began to blow, it ceased to bear its fruit.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

जब मन में ईश्वर की आज्ञाकारिता की चाह थी, तब उम्मीद का पेड़ हरा-भरा था; लेकिन जब गुनाहों की तेज़ हवा चलने लगी, तो उस पेड़ ने फल देना छोड़ दिया।

विस्तार

इस शेर में शायर ने दिल की दुनिया को एक बगीचे की तरह पेश किया है। जब तक मन में नेकी, इबादत और समर्पण की मंद बयार बहती रही, तब तक उम्मीदों का पेड़ हरा-भरा और खुशहाल था। लेकिन जैसे ही गुनाहों और गलतियों की बर्फीली आंधी चली, ज़िंदगी की शादाबी खत्म हो गई और उस पेड़ ने फल देना बंद कर दिया। यह शेर हमें समझाता है कि हमारी खुशियां और उम्मीदें सीधे तौर पर हमारी रूहानी पाकीज़गी से जुड़ी हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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