इक़तिज़ा फ़ितरत का रुकता है कहीं ऐ हम-नशीं शैख़-साहिब को भी आख़िर कार-ए-शब करना पड़ा

“Can nature's pressing urge ever be restrained, O companion? Even the pious Sheikh had at last to yield to the night's affair.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

ऐ दोस्त, क्या फ़ितरत का तक़ाज़ा कभी रुक सकता है? अंततः शैख़ साहब को भी रात के काम (ऐश-ओ-इशरत) में शरीक होना ही पड़ा।

विस्तार

इंसानी फ़ितरत और उसकी बुनियादी ज़रूरतों को ज़बरदस्ती दबाया नहीं जा सकता, चाहे कोई कितना भी बड़ा परहेज़गार क्यों न बन जाए। यहाँ शायर तंज़िया और हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहता है कि दुनियावी ख्वाहिशों से मुँह मोड़ने वाले ज़ाहिद शैख़ साहब भी आख़िरकार रात की आगोश और जिस्मानी तकाज़ों के आगे बेबस हो गए। यह शेर इंसानी कमज़ोरियों और कुदरत की ताक़त को मुस्कुराते हुए स्वीकार करने का एक खूबसूरत पैग़ाम है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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