मैं नज़्अ' में हूँ आएँ तो एहसान है उन का लेकिन ये समझ लें कि तमाशा नहीं होता

“In death's last throes I lie—their coming would be grace indeed; yet let them understand: this dying breath is not a spectacle to see.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मैं अपनी अंतिम सांसें ले रहा हूँ, अगर वे मिलने आएँ तो उनका एहसान होगा। लेकिन वे यह समझ लें कि किसी की मौत का मंज़र कोई तमाशा नहीं होता।

विस्तार

इस शेर में ज़िंदगी की आख़िरी साँसों की बेबसी और आशिक़ की ख़ुद्दारी का एक अनोखा संगम दिखता है। शायर कहता है कि अगर महबूब इस अंतिम घड़ी में आ जाए तो यह उस पर बहुत बड़ा एहसान होगा, मगर साथ ही वह साफ़ कर देता है कि यह कोई तमाशा नहीं है। यहाँ दर्द की शिद्दत भी है और अपनी इज़्ज़त-ए-नफ़्स की हिफ़ाज़त भी, कि मौत का यह नाज़ुक मंज़र किसी के लिए महज़ देखने की चीज़ न बन जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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