हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

“If we so much as breathe a sigh, infamy becomes our share; yet even when they commit murder, no whisper stirs the air.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

अगर हम सिर्फ़ आह भी भरते हैं तो बदनाम हो जाते हैं, जबकि वे क़त्ल भी कर दें तो उसकी कोई चर्चा तक नहीं होती।

विस्तार

अकबर इलाहाबादी का यह शेर समाज के दोहरे रवैये और नाइंसाफ़ी की बड़ी चुभती हुई तस्वीर खींचता है। एक तरफ़ कमज़ोर आशिक़ है, जिसकी दर्द भरी हल्की सी आह भी दुनिया की नज़र में गुनाह और बदनामी बन जाती है, तो दूसरी तरफ़ वो ताक़तवर महबूब है जिसके संगीन ज़ुल्मों पर भी सब आँखें मूँद लेते हैं। यह शेर महज़ इश्क़ तक महदूद नहीं, बल्कि दुनिया की उस कड़वी हक़ीक़त का आईना है जहाँ रसूख़दारों के बड़े गुनाह भी छुपा दिए जाते हैं और लाचारों का रोना भी जुर्म ठहरा दिया जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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