“The flowering bough sways and buds blossom breath by breath, whether or not the morning breeze holds sway in the garden.”
फूलों की डाली झूमती रहती है और हर पल कलियाँ खिलती रहती हैं, चाहे बाग़ में सुबह की हवा का प्रभाव असरदार हो या न हो।
इस शेर में बाग़ का एक बेहद ख़ूबसूरत मंज़र है, जहाँ फूलों की डालियाँ अपनी ही मस्ती में झूम रही हैं और कलियाँ लगातार खिल रही हैं, बिना इस परवाह के कि सुबह की ठंडी हवा का कोई असर है या नहीं। शायरी की रिवायत में सबा यानी सुबह की हवा को कलियों के खिलने की वजह माना जाता है, मगर यहाँ शायर एक बेपरवाह और अंदरूनी उमंग का जश्न मना रहा है। इसका गहरा पैग़ाम यह है कि सच्चा हौसला और ज़िंदगी की रवानगी बाहरी हालात या सहारे की मोहताज नहीं होती, बल्कि इंसान के भीतर से फूटती है।
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