“I know full well that weeping brings no gain; / Yet what else can I do, it brings a little solace all the same.”
मैं खुद यह समझता हूँ कि रोने से कुछ हासिल नहीं होता, लेकिन क्या करूँ कि इसी तरह दिल को ज़रा तसल्ली मिल जाती है।
इस शेर में शायर ने दिमाग़ की समझदारी और दिल की बेबसी के बीच की कशमकश को बड़े प्यारे अंदाज़ में बयां किया है। अक़्ल बखूबी जानती है कि आँसू बहाने से कोई बिगड़ी बात नहीं बनती, मगर जज़्बात तर्क के मोहताज नहीं होते। रो लेने से दिल का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है, और दर्द से जूझते हुए इंसान के लिए यही ज़रा सी तसल्ली बहुत बड़ी राहत बन जाती है।
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