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غزل

आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं

आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं
علامہ اقبال· Ghazal· 4 shers

یہ غزل وجود کے بنیادی سوال پر سوال اٹھاتی ہے، اور پوچھتی ہے کہ کیا مٹی اور فنا کا یہ عالم ہے یا تیرا پوشیدہ راز؟ کیا وہ جہاں جو نظر سے اوجھل ہے، وہ تیرا ہے یا میرا؟ یہ کلام زندگی کے مختلف پہلوؤں—جیسے درد، غم، دن اور رات—کے وجود کے ماخذ پر سوال کرتا ہے، اور یہ پوچھتا ہے کہ کیا یہ سب کچھ تم ہو یا میں۔

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1
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं वो जो नज़र से है निहाँ उस का जहाँ है तू कि मैं
पानी, धूल और वक़्त का ये आलम, क्या तेरा छिपा हुआ रहस्य है या मेरा? वो जहाँ जो नज़र से ओझल है, क्या तेरा है या मेरा?
2
वो शब-ए-दर्द-ओ-सोज़-ओ-ग़म कहते हैं ज़िंदगी जिसे उस की सहर है तू कि मैं उस की अज़ाँ है तू कि मैं
लोग ज़िंदगी को दर्द, शोक़ और ग़म की रात कहते हैं, लेकिन क्या तुम उसकी सुबह हो या मैं? क्या तुम उसकी अज़ान हो या मैं?
3
किस की नुमूद के लिए शाम ओ सहर हैं गर्म-ए-सैर शाना-ए-रोज़गार पर बार-ए-गिराँ है तू कि मैं
किसकी शोहरत या मौजूदगी के लिए शाम और सुबह इतने बेचैन हैं? क्या रोज़गार के बोझ पर तुम हैं या मैं?
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