मसनद-ए-गुल मंज़िल-ए-शबनम हुई — वली दकनी
“The throne of the rose became the resting place of dew; behold the exalted station of the sleepless, watchful eye.”
अर्थ
फूल का आसन ओस का ठिकाना बन गया; ज़रा जागती हुई आँख का रुतबा और मर्तबा तो देखो।
विस्तार
इस शेर में रात भर जागने वाली ओस की बूँद को एक 'जागती हुई आँख' (दीदा-ए-बेदार) का रूप दिया गया है। पूरी रात की बेदारी और लगन के बदले सुबह उसे गुलाब की नाज़ुक पंखुड़ी जैसा शाही तख़्त नसीब होता है। शायर बहुत ही प्यार से समझाते हैं कि जो आँखें या दिल इश्क़ और इबादत में रात भर जागते हैं, उन्हें आख़िरकार ज़िंदगी में सबसे हसीन और बुलंद मक़ाम हासिल होता है।
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