क्या कहे तारीफ़ दिल है बे-नज़ीर — वली दकनी
“How can one utter its praise? Matchless is the heart—every single letter of that treasury of secrets.”
अर्थ
दिल की क्या तारीफ़ की जाए, रहस्यों के इस ख़ज़ाने का एक-एक लफ़्ज़ और अक्षर बेमिसाल है।
विस्तार
शायर यहाँ दिल की बेपनाह गहराई और उसकी अज़मत पर हैरान होकर कहते हैं कि उसकी तारीफ़ के लिए लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं। दिल को उन्होंने 'मख़्ज़न-ए-असरार' यानी राज़ों का ख़ज़ाना कहा है, जिसका हर एक लफ़्ज़ और हर जज़्बा किसी अनदेखी हक़ीक़त का पता देता है। सूफ़ी रिवायत में दिल को खुदा का घर माना गया है, और यह शेर उसी रूहानी एहसास को बेहद सादगी और मोहब्बत से बयां करता है।
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